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महाराष्ट्र: 6 बड़ी ग़लतियां, जिसके कारण सत्ता से हटी बीजेपी

महाराष्ट्र की राजनीति के पल-पल बदलते घटनाक्रम ने कम से कम ये तो साबित कर ही दिया था कि राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है. लेकिन सवाल ये उठता है कि गोवा, मणिपुर और हरियाणा में सरकार बना लेने वाली बीजेपी से आख़िर चूक कहां हुई. आइए आपको बताते है क्या है वे 6 ग़लतियां

महाराष्ट्र चुनाव में बीजेपी से पहली ग़लती हुई जब विधानसभा चुनाव के दौरान एनसीपी प्रमुख शरद पवार के ख़िलाफ़ प्रवर्तन निदेशालय का नोटिस गया था. उस वक्त मुख्यमंत्री फडणवीस को मीडिया के सामने आ कर कहना पड़ा था कि राज्य सरकार बदले की भावना से काम नहीं कर रही है और इसमें सरकार को कोई हस्तक्षेप नहीं है. एनसीपी ऐसी पार्टी थी जो महाराष्ट्र में बफर की तरह काम कर रही थी. जब शिवसेना का दबाव होता था तो एनसीपी, बीजेपी की मदद के लिए आ जाती थी.2014 में जब बीजेपी के लिए बहुमत साबित करने की बारी थी तो एनसीपी ने उन्हें दिया था.चुनाव के दौरान वो पुल बीजेपी ने जला दिया. इसका नतीजा ये हुआ कि जब शिवसेना ने साथ छोड़ा तो कोई बीजेपी के साथ नहीं था.

दूसरी बड़ी ग़लती बीजेपी से ये हुई कि बीजेपी ने अजित पवार के रूप में एक ऐसे व्यक्ति पर भरोसा किया जिसको वो पांच साल तक भ्रष्टाचारी बता रहे थे साथ ही उन्होंने एक ऐसी चिट्ठी पर भरोसा किया था जो एक तरह से चोरी कर के लाई गई थी.शुरु से ही बीजेपी ये आकलन करने में नाकाम रही कि अजित पवार के साथ कितने विधायक होंगे. अब ऐसा लग रहा है कि बीजेपी ने सिर्फ़ उनकी बात पर भरोसा कर लिया था.

तीसरी बड़ी ग़लती बीजेपी से शरद पवार और अजित पवार के रिश्तों को समझने में भी हुई. ये दोनों एक परिवार के लोग हैं.बीजेपी ने ये सोचा था कि सत्ता में आने की कोशिश में ये परिवार टूट जाएगा. परिवार में एक भावनात्मक जुड़ाव होता है जो परिवार से अलग होने वाले व्यक्ति पर बड़ा मानसिक दबाव डालता है.अजित पवार को समझाना परिवार के लोगों के लिए इसलिए भी आसान था क्योंकि उप मुखयमंत्री का पद उन्हें एनसीपी-शिवसेना-कांग्रेस गठबंधन में भी मिल रहा था और बीजेपी के साथ जाने पर भी. इससे ज़्यादा उन्हें कुछ मिल नहीं रहा था.

चौथी बड़ी ग़लती बीजेपी से ये हुई कि एनसीपी प्रमुख शदर पवार की ताक़त को बीजेपी ने कम समझा. चुनाव से पहले शरद पवार के ख़िलाफ़ प्रवर्तन निदेशालय का नोटिस आने के बाद जिस तरह उन्होंने पलटवार किया था उसके बाद बीजेपी को कम से कम 15-20 सीटों का नुक़सान हुआ.महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार अभी भी बड़े नता हैं. इसमें कोई विवाद नहीं है और ये शरद पवार ने पूरी तरह साबित भी कर दिया. लेकिन बीजेपी ये बात नहीं समझ पाई.

पांवचीं बड़ी ग़लती बीजेपी से ये हुई कि राज्य में सरकार गठन के मामले में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को शामिल किया. ये काम सामान्य तरीक़े से भी हो सकता था जिसमें कैबिनेट की बैठक होती, उसमें राष्ट्रपति शासन वापस लेने का फ़ैसला होता और और फिर शपथ ग्रहण होता तो शायद पार्टी की उतनी बदनामी न होती.फिलहाल बातें हो रही हैं कि ऐसी क्या जल्दी थी कि सारे काम आधी रात को हुए. प्रधानमंत्री को इमरजेंसी प्रोविज़न्स का इस्तेमाल करना पड़ा और ये फ़ैसला लिया गया.

छठी बड़ी ग़लती बीजेपी से ये हुई कि उन्होंने कांग्रेस-शिवसेना-एनसीपी को भरपूर मौक़ा दिया कि वो अपने आपसी मतभेद मिटा कर साथ आएं और उनसे लड़ें. उनके पास इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था कि वो अपने सारे मतभेद भुला दें और एक हो जाएं, क्योंकि उनसे अस्तित्व पर ही अब सवाल खड़ा हो गया था. बीजेपी के पास एक मौक़ा था कि अगर एनसीपी के साथ ही गठबंधन करना था तो उन्हें सीधे शरद पवार के साथ बात करनी चाहिए थी.

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