Categories
News

बुलेटप्रूफ कार और जैकेट बंदूक की गोली को कैसे रोक लेते हैं?

खबरें

लेकिन ये ज़रूरी नहीं है कि हर शीशा टूट ही जाए. कुछ शीशे बहुत कर्रे होते हैं. उन्हें भेदना आसान नहीं. भले ही उस शीशे की तरफ बुलेट आ रही हो. हम बात कर रहे हैं बुलेटप्रूफ शीशों की. ये अचानक हम पीजे क्यों मार रहे हैं? वजह है एक खबर. और कोशिश उस खबर के तकनीकी पहलू समझने की.

पिछले हफ्ते कोलकाता में बीजेपी के अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर ह’मला हो गया. बीजेपी नेता कैलाश विजयवर्गीय को भी चोटें आई थीं. इसी के बाद उनके काफिले में एक बुलेटप्रूफ कार को शामिल किया गया है. अब वो इसी कार में बैठकर घूमा करेंगे.

अब अपने क्यूरियस मन में सवाल है. आखिर बुलेटप्रूफ कार और जैकेट में ऐसा क्या होता है कि उसे कुछ भेद नहीं पाता?

किसी साधारण कार को बुलेटप्रूफ बनाने के लिए उसे सबसे पहले खोल दिया जाता है. दरवाज़े वगैरह अलग कर लिए जाते हैं. फिर पूरी कार की बॉडी में कई प्लेट्स लगाई जाती हैं. स्टील, नायलॉन और केवलार जैसे मटेरियल की प्लेट्स. ये कार की बॉडी को इतना मज़बूत बना देती हैं कि बुलेट इसके पार नहीं जा पाती.

बाकी की बॉडी का तो समझ आता है कि बहुत ही स्ट्रॉन्ग मटेरियल से लपेटकर बुलेट को रोका जा सकता है. लेकिन उसके शीशे को मज़बूत कैसे बनाते हैं? शीशा तो ज़रा सा पत्थर मारकर तोड़ा जा सकता है. फिर बुलेटप्रूफ कार का शीशा बुलेट को कैसे रोकता है?

पहली बार बुलेटप्रूफ ग्लास 1909 में बनाया गया था. इसे बनाने वाले फ्रेंच केमिस्ट का नाम है एडॉर्ड बेनेडिक्टस . ये एक बहुत ही बुनियादी मॉडल था. प्लास्टिक का एक वेरिंएंट होता है सेल्यूलॉइड . बेनेडिक्टस ने दो ग्लास शीट के बीच में सेल्यूलॉइड लगा दिया. ये बुलेट्स को रोक लेता था.

अगर आपने क्रिकेट खेला है या ध्यान से देखा है तो आप इसकी फिज़िक्स कुछ-कुछ फील कर पाएंगे. जब एक क्रिकेट बॉल तेज़ी से किसी फील्डर की तरफ आती है, तो उसे पकड़ा कैसे जाता है? क्या वो फील्डर अपने हाथ एक जगह जमाकर झटके में बॉल पकड़ता है? नहीं. फास्ट बॉल को कैच करने के लिए फील्डर अपने हाथ बॉल के साथ थोड़ी पीछे ले जाता है.