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नव’रात्रि पर क्यों की जाती है कु’मारी क’न्याओं की पूजा, म’हत्व जानकर चौं’क जा’एंगे…..

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क’न्या पूज’न का म’हत्व
सभी शुभ का’र्यों का फल प्रा’प्त करने के लिए क’न्या पू’जन किया जाता है. कुमा’री पूज’न से सम्मा’न, ल’क्ष्मी, वि’द्या और ते’ज प्रा’प्त होता है. इससे वि’घ्न, भ’य और श’त्रुओं का ना’श भी होता है. हो’म, जप और दान से दे’वी इतनी प्र’सन्न नहीं हो’तीं जित’नी की क’न्या पूज’न से हो’ती हैं.

क्या होता है क’न्या पू’जन में
नौ क’न्याओं को नौ दे’वियों के रू’प में पू’जन के बाद ही भ’क्त व्र’त पूरा करते हैं. भ’क्त अपने सा’मर्थ्य के मु’ताबिक भो’ग लगाक’र द’क्षिणा देते हैं. इससे मा’ता प्र’सन्न हो’ती हैं. क’न्या पूज’न में दो से 11 सा’ल की 9 ब’च्च‍ियों की पू’जा की जाती है. दरअ’सल, दो व’र्ष की कु’मारी, तीन व’र्ष की त्रि’मूर्ति, चार व’र्ष की क’ल्याणी, पांच व’र्ष की रोहि’णी, छ व’र्ष की बा’लिका, सात व’र्ष की चंडि’का, आ’ठ व’र्ष की शा’म्भवी, नौ व’र्ष की दु’र्गा और द’स व’र्ष की क’न्या सुभ’द्रा कहला’ती हैं.

क्यों हो’ता है क’न्या पूज’न
दे’वी पुरा’ण के अनु’सार इं’द्र ने जब ब्र’ह्मा जी से भगव’ती को प्र’सन्न करने की वि’धि पू’छी तो उ’न्होंने स’र्वोत्तम वि’धि के रू’प में कुमा’री पूज’न ही बता’या था. नौ कुमा’री कन्या’ओं और एक कुमा’र को वि’धिवत घर में बुला’कर और उन’के पां’व धो’कर रो’ली-कुमकु’म लगाक’र पू’जा-अर्च’ना की जाती है. इस’के बाद उ’न्हें व’स्त्र आभूष’ण, फल पक’वान और अ’न्न दि’या जाता है. इससे भ’क्त पर मां श’क्ति की कृ’पा हमे’शा ब’नी रह’ती है.