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सावधान: रूसी वैक्सीन दे रहा हैं इतना ज्यादा साइड इफेक्ट, हो सकता हैं खतरा

देश में बुधवार को एक दिन में कोरोना से स्वस्थ होने वालों की सबसे बड़ी संख्या दर्ज हुई. केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक 56,383 लोगों ने बुधवार को कोरोना को मात दी. आंकड़ों के मुताबिक देश में कोरोना से औसत रिकवरी दर 70 फीसदी से ज्यादा हो गई है. इसके साथ ही देशभर में एक दिन में सबसे ज्यादा 7 लाख 33 हजार 449 टेस्ट किए गए.

रूस के कोरोना वैक्सीन बनाने के दावे के बाद से ही विवाद भी शुरू हो चुका है। अमेरिका से लेकर जर्मनी तक मास्को की वैक्सीन स्पूतनिक-वी पर शक जाहिर कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी रूस से कई सबूत मांग लिए हैं। इधर कई विशेषज्ञ वैक्सीन बनाने की हड़बड़ाहट में उसकी सुरक्षा और प्रभाव को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, जबतक तीसरे स्टेज के डेटा पर चर्चा नहीं हो जाती वैक्सीन को सुरक्षित नहीं कहा जा सकता है। इस बीच, रूस ने कहा है कि उसे 20 देशों से करोड़ों डोज का ऑर्डर मिल चुका है।ओटागो यूनिवर्सिटी के संक्रामक रोग मामलों के विशेषज्ञ प्रोफेसर डेविड मर्डोक ऑक्सफोर्ड की कोरोना वैक्सीन पर अपनी टिप्पणी में कहा कि जिस वैक्सीन के सबसे पहले और प्रभावी होने की बात कही जा रही है उसका तीसरे चरण का ट्रायल अगले साल के शुरू में खत्म होगा।

सबसे असल चुनौती ये है कि वैक्सीन की सेफ्टी से समझौता नहीं किया जाए।मर्डोक ने कहा कि आप वैसी चीज की तैयारी कर रहे हैं, जिसके लिए पेपरवर्क की जरूरत होती है और जब सभी स्टडी पूरी हो जाए तो हम वैक्सीन ला सकते हैं। तबतक हमें थोड़ा धीरज रखना होगा। किसी दूसरे वैक्सीन की तरह ही हमें इसके सेफ्टी की जांच भी करनी होगी।हालांकि जिस तरह से कुछ देश कोरोना वैक्सीन की तैयारियों में जुटे हैं उससे कई विशेषज्ञ वैक्सीन की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। ऑकलैंड विश्वविद्यालय की प्रोफेसर निकी टर्नर ने कहा कि रूस के वैक्सीन को रजिस्टर किया गया है लेकिन उसके तीसरे चरण का ट्रायल उतना भरोसेमंद नहीं है। उन्होंने कहा, ‘यहां बड़ा खतरा है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऐसा वैक्सीन है, जिसे मुझे छूने में भी डर लगेगा। सबसे अहम है कि वैज्ञानिक अपने डेटा को पब्लिश करे और वह डेटा पारदर्शी हो। ताकि बाहर लोग आपके डेटा पर चर्चा कर सके।’ उन्होने कहा कि रूस जैसे ही हड़बड़ी में कोरोना वैक्सीन जारी करने से बचना चाहिए। लोगों में वैक्सीन को लेकर सुरक्षा की भावना होनी चाहिए।ऑक्सफोर्ड संस्थानों के वैज्ञानिकों का मानना है कि रूस के शॉर्टकट से सेहत को खतरा हो सकता है। वैज्ञानिकों का तर्क है कि वैक्सीन के मनुष्यों पर ट्रायल में कई वर्ष लगते हैं, जबकि रूस ने ये दो महीने से भी कम में किया है। WHO के प्रवक्ता तारिक जसारविक ने कहा कि वैक्सीन को अनुमति देने से पहले असर और सुरक्षा को जांचा जाता है उसके बाद ही निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है।