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दलदल में फंसे जवान भूख से तड़प रहे थे, पर खुद बनें निवा’ला!! 900 सै’निकों को मगरम’च्छ नें जिंदा चबाया……

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दुनिया में अब तक दो विश्व यु’द्ध हुए हैं और इनमें द्वितीय विश्व यु’द्ध को सबसे घा’त’क माना जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें जा’पा’न के ऊपर पर’मा’णु ब’मों का प्रयोग किया गया. द्वि’तीय विश्व यु’द्ध में जा’पा’न को हार मिली और करीब 21 लाख जापा’नी सै’निकों को मौ’त हुई. लेकिन इनमें से 980 सै’नि’क ऐसे थे, जिनकी मौ’त का कारण म’गरम’च्छ थे. इन म’गरम’च्छों ने जा’पा’नी सै’नि’कों को बेर’हमी से जिं’दा ही खा लिया. युद्ध इ’तिहास में इसे बेहद ही क्रू’र तरीके से हुई मौ’त के रूप में याद किया जाता है. ये घ’टना आज ही दिन 19 फरवरी, 1945 को म्यां’मार में हुई थी.

द्वितीय विश्व यु’द्ध के दौ’रान सन 1942 में जा’पा”नी इं’पी’रि’यल सेना ने रा’म्री द्वी’प पर क’ब्जा कर लिया. वर्तमान में ये द्वीप म्यांमा’र के तट के पास ही स्थित था. रण’नी’तिक रूप से रा’म्री बेहद ही मह’त्वपू’र्ण जगह थी. ऐसे में मित्र राष्ट्रों को लग’ने लगा कि इसे क’ब्जे में लेना जरूरी है. इस तरह 1945 में द्वीप पर क’ब्जा करने के लिए मित्र राष्ट्रों ने ह’म’ला करना शुरू कर दिया. इसके करीब एक ए’यरबे’स बनाया गया ताकि अभि’यान को मदद पहुंचाई जा सके. बता दें कि मित्र राष्ट्रों में ब्रि’टेन,अ’मेरि’का और रूस, जबकि धु’री रा’ष्ट्रों में ज’र्मनी, जा’पान और इटली शा’मिल थे.

जापानी सै’निकों को मैं’ग्रोव के द’लद’ल में खदे’ड़ा गया

राम्री द्वीप पर दोनों गुटों के बीच खू’नी सं’घर्ष हुआ. यहां बड़ी संख्या में जा’पानी सै’निक तै’नात थे और मित्र रा’ष्ट्र क’ब्जे के लिए किसी भी ह’द तक जाने के लिए तैयार थे. दोनों गु’टों के बीच ज’बरद’स्त घ’मासान जारी थी. आखिरकार मित्र राष्ट्रों की सै’निकों को जापानी जवानों के ऊपर बढ़त हासिल हुई. जा’पानी सै’निकों को राम्री द्वीप के घ’ने मैं’ग्रोव द’लदलों में ध’केल दिया गया. मैं’ग्रो’व का ये द’लदल राम्री द्वी’प के करीब 16 किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ था. बिना खाना-पानी जा’पा’नी सै’निक यहां फं’स गए. मैं’ग्रोव होने की वजह से मच्छरों का आतं’क यहां अधिक था. लगातार म’च्छरों के का’टने और साफ पानी उपलब्ध नहीं होने के चलते जा’पानी सै’निक परेशान हो रहे थे.