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दया याचिका खारिज होने के बाद भी कुछ को ही क्यों हो पाती है फां’सी

निर्भया केस के गुनह’गार की रिव्यू पिटिशन सुप्रीम कोर्ट से खारिज हो गया है.जिसे लेकर निर्भया की मां ने उम्मीद जताई है कि गुनहगार जल्द ही अपने असल अंजाम यानी फां’सी के फंदे तक पहुंचेंगे. आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में रेपि’स्टों को मौत की सजा के लिए ‘दिशा’ जैसे कानून बनाए जा रहे हैं, जल्द से जल्द ट्रायल पूरा करने के लिए समयसीमा तय की जा रही है लेकिन ब’र्बर से ब’र्बर मामलों के तमाम दोषी अभी भी फंदे के इंतजार में हैं. दोषी को फंदे से लटकाया जाए उससे पहले उन्हें हर मुमकिन मौका दिया जाता है ताकि वे सभी संभावित कानूनी विकल्पों का इस्तेमाल कर सकें.



आपको बता दें कि ट्रायल कोर्ट में फांसी की सजा पर ऊपरी अदालतों की मंजूरी बहुत जरूरी होती है. निचली अदालतों में लंबे वक्त तक केस चलता रहता है. हालांकि महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों के जल्द निपटारे की कोशिशें की जा रही हैं. निचली अदालत में सजा के बाद ऊपरी अदालत से उसकी मंजूरी भी जरूरी है. हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी होने के लिए कोई समयसीमा नहीं है. सुप्रीम कोर्ट से भी मौत की सजा के बाद दोषी 30 दिनों के अंदर रिव्यू पिटिशन दे सकता है. रिव्यू पिटिशन भी खारिज हो जाए तो क्यूरेटिव पिटिशन का ऑप्शन है. जिसके लिए भी कोई समयसीमा तय नहीं है. क्यूरेटिव पिटिशन के भी खारिज होने के बाद दोषी के पास दया याचिका का भी विकल्प होता है.

दया याचिका खारिज होने के बाद भी दोषी को फंदे से लटकाया ही जाएगा, ये कहा नहीं जा सकता.आपको बता दें कि राजीव गांधी हत्याकांड और नोएडा का निठारी कांड इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. 2006 में सामने आए नोएडा के निठारी केस में सुरेंद्र कोली और मनिंदर सिंह पंढेर के खिलाफ 16 केस दर्ज हुए थे. कोली को 11 मामलों में ट्रायल कोर्ट ने मौत की सजा दी जबकि 5 केस अभी भी लंबित हैं

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